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Sunday, 11 December 2016

ये कैसा जहां है ?

 वो हादसा ही था 
 जिसने मुझे अंदर से दिया मार ,

 टूट चुकी थी मैं ,
 हुई थी मेरे जीवन की सबसे बड़ी हार ।


 बचा ही नहीं सकी अपनी बच्ची को,

 इन काफीरों ने उसे मार डाला ,

 वो फल नसीब हुआ ही कहाँ ?
 जिसके पेड़ को अपने हाथो से बढ़ाया और पाला ।


 वो रोने की अावाज ,
 वो खिलखिलाती हंसी,
 सुनने के लिए तरसते थे कान,


 क्या किमत है मां के ममता की ,
 और कहाँ वो ननही सी जान ?


 जो ये दुनिया देखने से पहले ही
 छोड़ गई अपने प्राण ।


 आंखो से ये अांसु , अब रुकते कहाँ है,
 भावनाअों की कोई कीमत नहीं ?
 ये कैसा जहां है ?
                           




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